Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
आत्मभरित्वेन निजे घ्राणे स्वं गन्धमागते ।
अहं घ्रातेति यो माता तं चौरं नैव वेद्म्यहम् ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
अपनी नासिका की अभिलाषावश अपने गन्ध को प्राप्त होने पर मैं सूँघनेवाला हूँ” ऐसे जिसे
अभिमान होता है, उस चोर को मैं जानता ही नहीं हूँ