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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

मृगतृष्णाक्रमेणैषा भावना व्यर्थभाविनी । भावस्तस्यामसत्यायां यः सोऽयमिति संभ्रमः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

पूर्वोक्त स्थलों में प्रसिद्ध यह अहन्ता की कल्पना मृगतृष्णा के समान व्यर्थ होती है। उस अहन्ता की कल्पना के निर्विषय होने पर यह (देह) अहम्‌" (मैं) हूँ, इस प्रकार का जो भाव है, वह भ्रान्ति ही है, इसलिए देह में अहंभाववासना का सर्वथा त्याग करना चाहिये