Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 64
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
तृष्णयैव विनष्टाः स्थ व्यर्थमिन्द्रियबालकाः ।
कोशकारकुकृमयस्तन्तुनेव स्वयंभुवा ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
अतएव अज्ञानियों ने तृष्णा से ही इन्द्रियों का विनाश किया है, ऐसा कहते हैं।
हे इन्द्रियरूपी बालकों, जैसे रेशम के कीड़े अपने से उत्पन्न हुए तन्तु से नष्ट हो जाते है वैसे ही तुम
लोग भी स्वतः उत्पन्न हुई तृष्णा से ही नष्ट हुए हो