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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 65

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 65 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 65

संस्कृत श्लोक

तृष्णयैवेह लुठथ जरामरणसंकटे । भ्रमदृष्ट्येव शिखरिपथिकाः श्वभ्रभूमिषु ॥ ६५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे पर्वत के पथिक पर्वत के शिखर पर जाते-जाते पित्तवश घूम रही दृष्टि से गिरकर विषम गर्तमय भूभाग में गिरते हैं वैसे ही जरा, मरण आदि क्लेशों से पूर्ण इस संसाररूपी पत्थर कंकड़ पूर्ण भूमि में तुम लोग तृष्णा से ही लुढ़क रहे हो