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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 67

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

कल्पनामात्रकलिता सत्यैषा हि न वस्तुतः । असंकल्पनमात्रेण दात्रेणेव विलूयते ॥ ६७ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र भ्रान्ति से बनाई हुई यह (वासना) वस्तुतः सत्य नहीं है। हँसिये से पत्तों के समान एकमात्र असंकल्प से ही यह काटी जाती है