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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 52, Verse 68

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 52, verse 68 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 68

संस्कृत श्लोक

एषा हि भवतामेव विमोहाय क्षयाय च । वातलेखेव दीपानां स्फुरतामपि तेजसाम् ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे वायु का झोंका दीपकों के तथा चमक रहे उल्का, बिजली आदि तेजो के विनाश के लिए होता है वैसे ही बढ़ रही यह (वासना) आप लोगों के ही विमोहन और क्षय के लिए (मरण आदि दुःख के लिए) है