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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

उद्दालक उवाच । अपारपर्यन्तवपुः परमाण्वणुरेव च । चिदचेत्या तदाक्रान्तौ न शक्ता वासनादयः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उद्दालक ने कहा : परिच्छिन्न तिल आदि फूल आदि से वासित होते हैं आत्मचित्‌ तो आर- पाररहित (असीम) हे । स्थूल पृथिवी, जल, तेज, वायु कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थो से वासित होते है, चित्‌ तो परमाणु से, अपंचीकृत आकाश से ओर अव्याकृत आकाश से सूक्ष्मतम हे, अतएव उसका तनिक भी स्पर्श करने के लिए वासना आदि समर्थ नहीं हैं। साक्षात्‌ उसके स्पर्श में असमर्थ होने पर भी उसके चैत्य के स्पर्श द्वारा वासना आदि उसका स्पर्श करेगे । ऐसा कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि वह चैत्य रहित है

सर्ग सन्दर्भ

बावनवाँ सर्ग समाप्त तिरपनवाँ सर्ग वासनाओं तथा अहंकार से आत्मा की अस्पष्टता तथा शरीर और मन का वैर इत्यादि का वर्णन |