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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

मनः शेमुष्यहंकारप्रतिबिम्बैर्जडेन्द्रियैः । वासनावितताः शून्या वेतालत्रासनोद्यताः ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई प्रश्न करे कि चैत्यन्यरूप तुम्हारे द्वारा अप्रकाशित विषय में वासना का उदय नहीं दिखाई देता, अतः तुम्ही से ये वासना आदि विस्तारित हैं इस पर ये तुम्हारा स्पर्शन करनेवाले कैसे हैं ? तो इस पर कहते हैं। मैंने उनका विस्तार नहीं किया है, किन्तु बुद्धि में और अहंकार में चित्‌ के प्रतिबिम्बवश जड़ इन्द्रियों द्वारा गृहीत विषयों की सूक्ष्म अवस्थारूप अतएव शून्य (असत्‌-रूप) होती हुई भी वेतालों के समान त्रास देने में उद्यत विस्तृत वासनाओं का मन अनुभव करता है