Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तत्कृतेभ्यो विचारेभ्योऽनुभूतेभ्योऽपि भूरिशः ।
भूयोऽप्यनुभवत्यन्तरहं हि चिदलेपिका ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
जाग्रत् अवस्था में बुद्धि और
अहंकार से बहुत बार किये गये विषय विचारों से और मन से अनुभूत विषयों से मेरा संपर्क नहीं है,
क्योंकि लेप रहित चित् ही मैं हूँ, मन आदि का संघातरूप नहीं हूँ। श्रुति ने भी कहा है : "स यत्तत्र
किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगो ह्ययं पुरुषः“ वह (स्वप्नदर्शी पुरुष) वहाँ (स्वप्न में) जो कुछ
देखता है, उससे असंस्पृष्ट होता है, क्योंकि यह पुरुष असंग है