Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
स्वदुर्भावोपरचितां देहः संसारसंस्थितिम् ।
गृह्णात्वथ त्यजतु वाप्यहं हि चिदलेपिका ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
एवं स्थूल शरीर से किये गये पाप-पुण्यरूप कर्म से भी उसका सम्बन्ध नहीं होता, ऐसा कहते हैं।
देह अपनी दुश्चेष्टाओं से वृद्धि को प्राप्त हुई संसारस्थिति का चाहे ग्रहण करे, चाहे त्याग करे,
किन्तु मैं तो उसकी दोनों अवस्थाओं में निर्लेप चित् ही हूँ