Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
एवं ब्रह्मात्मकमिदं यत्किंचिज्जगति स्थितम् ।
सदेवास्मि तदेवास्मि परिशोचामि किं मुधा ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सद्वस्तु से व्यतिरिक्त इदं पदार्थ का अन्वेषण करने पर भी उसका मिथ्यात्व ही अन्त
में सिद्ध होता है, यों सद् ब्रह्मअद्वैत का साम्राज्य प्रतिष्ठित हुआ। शोक का अवकाश ही कहाँ है ? ऐसा
कहते हैं।
इस प्रकार जो कुछ भी इस जगतीतल में स्थित है, वह सब ब्रह्मस्वरूप ही है। मैं "सत्" (ब्रह्म) ही
हूँ, मेँ "तत्" (ब्रह्म) ही हूँ, व्यर्थ शोक क्यों करता हूँ ?