Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
एकस्मिन्नेव विमले पदे सर्वगते स्थिते ।
अहंकारकलङ्कस्य कथं नामोदयः कुतः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
सत्-अबद्वैत की सिद्धि के बल से भी अहंकार का निरास किया जा सकता है इस आशय से कहते हैं ।
सर्वव्यापक एक ही निर्मल पद के रहने पर अहंकार रूप कलंक का कैसे और कहाँ से उदय हो
सकता है ?