Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
स्फुरत्यहंकारघने हृद्व्योम्नि सलिलात्मनि ।
विकसत्यभितः कायकदम्बे दोषमञ्जरी ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
दुर्वासनारूपी जल से भरे हुए हृदयरूपी
आकाश में अहंकाररूपी मेघ के विकास को प्राप्त होने पर शरीररूपी कदम्ब वृक्षरूपी आकाश में
अहंकाररूपी मेघ के विकास को प्राप्त होने पर शरीररूपी कदम्बवृक्ष पर दोषरूपी मंजरियाँ चारों ओर
से विकसित हो उठती है