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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

असदभ्युत्थिते विश्वे तज्जाते भ्रमसन्मये । असन्मयपरिस्पन्दे त्वहं त्वं चेति कः क्रमः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

अपनी तृष्णारूपी काली नागिनें, जिन्होंने देहरूपी वृक्ष में अपना बिल बनाया है, विचाररूपी गरुड के आने पर न मालुम कहाँ चली जाती हैं ॥३ ३॥ इसलिए विश्व के मिथ्याभूत अज्ञान से उत्पन्न अतएव अध्यास से ही सन्मय और असन्मय व्यवहारवाला होने पर “त्वम्‌” (तुम) "अहम्‌" (मैं) इस प्रकार का भेदव्यवहार भी क्या है ?