Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अहंभावे परिक्षीणे शुष्कः संसारपादपः ।
भूयः प्रयच्छत्यरसो न पाषाणवदंकुरम् ॥ ३२ ॥
स्वतृष्णाकृष्णभोगिन्यो देहद्रुमकृतालयाः ।
क्वापि यान्ति विचारात्मन्यागते विनतासुते ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अहंकार के क्षीण होने पर सूखा हुआ संसाररूपी वृक्ष रागरूपी अंकुर
की उत्पादनशक्ति से रहित अतएव पत्थर के तुल्य होकर फिर अंकुर को उत्पन्न नहीं करता है, पनपता
नहीं है