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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 37

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 37

संस्कृत श्लोक

मध्येतरपयोमात्रं कंचित्कालं चलाचलम् । आद्यन्तसौम्यते त्यक्त्वा वारि वीचितया यथा ॥ ३७ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ में दृष्टान्त कहते हैं। जैसे जल, जो कि पूर्वं और उत्तर कालमें तरंग आदि से अविकृत केवल मात्र जलरूपसे स्थित रहता है, मध्य में कुछ समय के लिए चंचल होकर पूर्व ओर उत्तर काल में प्रसिद्ध सौम्यता का त्याग कर तरंगरूप होकर जल ही रहता हे दूसरी वस्तु नहीं होता वैसे ही देह आदि भी तीनों कालों मे ब्रह्म ही हैं, उससे अतिरिक्त नहीं हैं