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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

अस्मिन्क्षणपरिस्पन्दे देहे विसरणोन्मुखे । तरङ्गे च निबद्धास्था ये हतास्ते कुबुद्धयः ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस देह में जो केवल एक क्षण के लिए चेष्टा युक्त है, और भगोन्मुख (जिसका भंग तुरन्त होना ही चाहता है) तरंग में जिन्होंने अहंरूप से विश्वास किया वे मन्दमति उसके नाश से नष्ट हो गये यानी भगोन्मुख तरंग के समान क्षण विनश्वर तथा जीवनरूप एक क्षण के लिए चेष्टायुक्त शरीर में अहंरूप से आस्था मन्दमतियोँ की ही हो सकती है, अन्यो की नहीं