Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verses 41–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verses 41–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 41-43
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नविकारेषु यथा संभ्रमदृष्टिषु ।
यथा वा मदलीलासु यथा नौयानसंभ्रमे ॥ ४१ ॥
यथा धातुविकारेषु यथा चेन्द्रियविक्लवे ।
यथातिसंभ्रमानन्दे दोषावेशदशासु च ॥ ४२ ॥
दृश्यते क्षीयते चैव रूपं सदसतोश्चलम् ।
तथैवेयमिह त्वेषा काले न्यूनातिरिक्तता ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई पूछे कि स्थूल. सूक्ष्म देह आदि यदि असत् ही हैं, तो उनका भान कैसे होता है, इस पर
कहते हैं।
जैसे स्वप्न के विकारों मेँ असत्य भी स्वशरीरोच्छेद आदि सत्य-सा प्रतीत होता है, जैसे बाघ, चोर
आदि की भयदृष्टियों में बाघ आदि के न रहने पर भी सर्वत्र बाघ आदि की शंका होती है, मदिरा आदि
के नशे में न घूमती हुई पृथिवी भी, घूमती हुई-सी प्रतीत होती है अथवा जैसे नाव की सवारी से हुए भ्रम
में पृथिवी पेड़ आदि के न चलने पर भी वे चलते हुए-से प्रतीत होते हैं, जैसे वात, पित्त आदि के
संनिपात में भय आदि के हेतु के न रहने पर भी भय आदि होते हैं, जैसे नेत्र आदि इन्द्रिय के दोष दूषित
होने पर द्विचन्द्रत्वआ्रान्ति होती है, जैसे अतिप्रियतम के लाभ आदि से होनेवाले आनन्द में और विधुरों
की काम आदि दोषावेश दशाओं में भाव और अभाव का रूप चंचल यानी केवल प्रतीतिकाल में ही
स्थायी रहता है कुछ कामिनी आदि का स्वरूप दृष्टिगोचर होता है शीघ्र ही बाध होने से नष्ट हो जाता
है वैसे ही यह स्थूल, सूक्ष्म देह आदिरूप जगत् की भ्रान्ति भी है। अन्तर केवल इतना ही है कि स्वप्न
आदि थोड़े समय तक रहते हैं और जगत् भ्रम मोक्ष पर्यन्त रहता है यों समय में न्यूनता ओर अधिकता
के सिवा उनमें विशेषता नहीं हे