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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

सा च त्वया कृता नित्यं चित्त दुःखसुखोदये । यथा वियोगयामिन्यो मतयो हन्ति रागिणम् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे चित्त, जैसे पुत्र, आदि के न मरने पर भी वंचक पुरुष के कथन से उत्पन्न हुई उनके मरण की बुद्धि तथा उससे कल्पित वियोग दुःख रागी पुरुष को मार डालते हैं वैसे ही वह समय में न्यूनता और अधिकता तुम्हें पीडित करती हैँ जिसे तुमने व्यवहारिक वस्तुओं में सत्यता के भ्रम से वियोग ओर संयोगवश नित्य सुख और दुःख के उदय में निमित्त बना रक्खा हे