Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
अकृत्रिमविरोधस्थौ यत्र संघटितावुभौ ।
धारा इव पतन्त्येव तत्रानर्थपरम्पराः ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई प्रश्न करे कि मन और देह के रहने पर जीव की क्या क्षति है ? तो उस पर कहते हैं।
स्वाभाविक विरोधवाले ये दोनों जहाँ पर इकट्ठे होते है वहाँ पर जैसे लड़ रहे दो योद्धाओं के मध्य में
स्थित पुरुष के शरीर पर तलवार और बाणों की बौछार गिरती है वैसे ही अनर्थो की परम्पराएँ अवश्य ही
गिरती है