Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
मिथो विरुद्धसंसर्गे रतिमेत्यधमो हि यः ।
त्यक्तव्यः स पतद्वारावग्निराशावलेपने ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर विरुद्ध देह और मन जहाँ पर संघटित होते है उस वैषयिक सुखभोग में जो मूर्ख
अनुराग रखता है उसे आवरणरहित (खुले हुए) बड़वानल में, जिसमें निरन्तर समुद्र का जल गिरता है,
फेंक देना चाहिये। वह वहाँ पर भी अनुराग करेगा | वैषयिक सुख भोग बड़वानल से कम भीषण नहीं है ।
वैषयिक सुखभोग में अनुराग करनेवाला बड़वानल में भी अवश्य अनुराग करेगा, यह भाव है