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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verse 75

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verse 75 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 75

संस्कृत श्लोक

पदं तदनुयातोऽस्मि केवलोस्मि जयाम्यहम् । निर्वाणोस्मि निरंशोस्मि निरीहोस्मि निरीप्सितः ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

मैं उस परमपद को प्राप्त हो चुका हूँ। मैं सजातीय विजातीय और स्वगत भेद रहित हूँ, मैं सबसे उत्कृष्ट ब्रह्मरूप हूँ, तीनों तापों की शान्ति से निर्वाणरूप हूँ, परिपूर्ण होने के कारण अंशरहित हूँ, आप्तकाम होने के कारण मुझे किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है अतएव मैं निरीह हूँ