Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 53, Verses 76–77
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 53, verses 76–77 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 76,77
संस्कृत श्लोक
इदानीमस्म्यसंबद्धो मनोदेहेन्द्रियादिभिः ।
पृथक्कृतस्य तैलस्य तिलैर्विगलनैरिव ॥ ७६ ॥
स्वस्मात्पदवरादस्माल्लीलया चलितस्य मे ।
पृथक्कृतमतेः किंच परिवारो ह्ययं शुभः ॥ ७७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे तिलों से पृथक् किये गये तेल का पेरे हुए तिलों से
कोई संबन्ध नहीं रहता वैसे ही मन, देह, इन्द्रिय आदि से अब मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रारब्ध शेष के
भोग के लिए इस स्वात्मरूप श्रेष्ठ पद से व्यवहाराभास में अवतीर्ण हुए पूर्व वासना से पृथक्कृत मतिवाले
मेरा यह देहेन्द्रिय आदि परिवार परिजन की भाँति विनोद हेतु है