Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
तिलेभ्य इव तैलानि पृथक् चक्रे प्रयत्नतः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः कूर्मोऽङ्गानीव गोपयन् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार कछुआ अपने रंगों एवं इन्द्रियो को
विषयों से इस प्रकार पृथक् कर देता हे । जिस प्रकार तिलो से तेल पृथक् किया जाता हे