Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
बाह्यस्पर्शानशेषेण जहौ दूरे स धीरधीः ।
सहसा कुण्डकच्छन्नो मणिर्दूरत्विषो यथा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस
प्रकार छोटे कुण्डे से सहसा ढकी हुई मणि दूर तक फैली हुई किरणों को छोड देती है उसी प्रकार समस्त
बाह्य स्पर्शो को (बाह्य विषयों के) उस धीर बुद्धिवाले ने सहसा दूर छोड दिया