Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
विलीनानान्तरांश्चक्रे स्पर्शानुज्झितदर्शनात् ।
रसान्विटपकोशस्थान्मार्गशीर्ष इव द्रुमः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार वृक्ष
पत्रों के कोश में स्थित रस को (जल को) मार्गशीर्षं मे नष्ट कर देता है उसी प्रकार उन्होने समस्त
वस्तुओं का दर्शन छूट जाने से मनोवासना रूप आभ्यन्तरिक विषयों को आकर्षण द्वारा बाध होने से
अधिष्ठानतत्त्व मेँ विलीन कर दिया