Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
स्वात्मरत्नप्रकाशाढ्यां स्पष्टां कुसुमलाञ्छिताम् ।
दधार कन्धरां धीरो मेरुः शृङ्गशिखामिव ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे मेरु अपने रत्नों के प्रकाश से पूर्ण एवं कल्पवृक्षो के पुष्पों से सुशोभित अतएव विशद शिखर
को धारण करता है वैसे ही उस धीर ने अपने आत्मरूपी रत्न के प्रकाश से प्रकाशित तथा प्रसन्न
मुखरूप कमलपुष्प से सुशोभित एवं रजोगुण तथा तमोगुण से अनावृत कन्धे को धारण किया