Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
तेजस्युपरते तस्य घूर्णमानं मनो मुनेः ।
निशाब्जवदगान्निद्रा लोलं क्षीबवदेव वा ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार सूर्य के अस्त होने पर रात्रि
में तालाब की तरगों से चंचल कमल बन्ध हो जाता है अथवा जिस प्रकार उन्मत्त घूरता हुआ शराबी
रात्रि में नशे से निद्रा को प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार उस मुनि का चंचल और घूरता हुआ मन तेज:पुंज
के उपरत होने पर विषय का लाभ न होने से निद्रा में डूब गया