Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
मेघमालामिव मरुद्व्यालो नीलाब्जिनीमिव ।
यामिनीमिव तीक्ष्णांशुस्तामप्याशु लुलाव सः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार वायु मेघ पंक्ति को,
दुष्ट हाथी नीलकमलिनी को और सूर्य रात्रि को छिन्न-भिन्न कर देता है उसी प्रकार उस मुनि ने उस
निद्रा को भी शीघ्र छिन्न-भिन्न कर दिया