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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

चिरानुसंधानवशात्स्वदनाच्च स्वसंविदः । ततश्चिन्मयतामागाद्धेम नूपुरतामिव ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके अनन्तर, सुवर्ण जिस प्रकार नूपुर भाव को प्राप्त करता है अर्थात्‌ नूपुराकार मेँ परिणत हो जाता है उसी प्रकार पूर्वमे ध्यानादि से चिरकाल तक किये गये अनुसन्धानवश ओर समाधि में किये गये अनुभव द्वारा रसास्वाद के कारण फिर वहीं आकृष्ट हुआ चिदाकारवृत्ति को प्राप्त हो गया, अर्थात्‌ चिदंशप्रधान सविकल्प समाधि के रूप में परिणत हो गया