Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चित्तत्वमथ संत्यज्य चित्तं चित्तत्त्वतां गतम् ।
अन्यदेव बभूवाशु पङ्कः कुम्भस्थितो यथा ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार सविकल्प समाधि से क्रमशः इन्धनशून्य अग्नि की तरह दिन पर दिन क्षीण हो रहा
उनका मन क्षीर नीर के समान चिदेकरस बन गया, ऐसा कहते हैं।
इसके अनन्तर जिस प्रकार घड़े में स्थित पंकिल जल का पंक जल के सूख जाने पर घट भाव
को प्राप्त करता है अर्थात् घट से सम्बद्ध हो जाता है उसी प्रकार अपने चित्तत्व को छोड़कर
आत्मतत्त्वरूप एकरसता को प्राप्त हुआ उनका चित्त पूर्ववस्था से अन्य ही हो गया अर्थात् अधिष्ठान
चित्तत्त्व में लीन हो गया