Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verses 74–76
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verses 74–76 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 74-76
संस्कृत श्लोक
उद्दालकोऽत्र षण्मासान्दूरोत्सारितसिद्धिभूः ।
उषित्वोन्मिषितोम्भोदकोशादर्को मधाविव ॥ ७४ ॥
ददर्श संप्रबुद्धात्मा पुनः परमतेजसः ।
प्रणामलालसाः स्निग्धाश्चन्द्रविम्बवपुर्धराः ॥ ७५ ॥
रमणीर्गौरमन्दाररेणुभ्रमरचामराः ।
स्फुरत्पताकापटला द्युविमानपरम्पराः ॥ ७६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार सूर्य चैत्र मास में नीहार
पटल (कुहरे) से दूर रहता है उसी प्रकार उद्दालक ऋषि सिद्धियों से दूर रहे । समाधि में छः महीने वास
करके समाधि से जागरूक उन्होने परम तेजस्विनी, प्रणाम करने की लालसावाली तथा चन्द्रबिम्ब के
सदृश शरीर को धारण की हुई स्नेह युक्त रमणियों को देखा एवं गौर मन्दारपुष्पों की धूलि से धूसरित
भ्रमरो से (भरो से) ओर चँवरो से युक्त फहराती हुई पताकाओं के समूहवाली दिव्यविमानों की पंक्तियों
को देखा