Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verses 81–83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verses 81–83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 81
संस्कृत श्लोक
हारचामरधारिण्यो विद्याधरवराङ्गनाः ।
पश्येमास्त्वमुपासीनाः करिण्यः करिणं यथा ॥ ८१ ॥
कामो धर्मार्थयोः सारः कामसाराः सुयोषितः ।
वसन्त इव मञ्जर्यः स्वर्ग एव भवन्ति ताः ॥ ८२ ॥
एवं कथयतः सर्वानतिथीनित्यसौ मुनिः ।
परिपूज्य यथान्यायमतिष्ठद्गतसंभ्रमम् ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस प्रकार हाथियों के चारों ओर हथिनियाँ उसकी उपासना करती
है उसी प्रकार हार एवं चँवरों को धारण की हुई गन्धर्व ललनाएँ आपकी उपासना करती हुईं खड़ी हैं,
कृपया इनको देखिये