Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 92
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 92 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 92
संस्कृत श्लोक
चित्सामान्यचिराभ्यासात्सत्तासामान्यमेत्य सः ।
दृश्येऽस्मिंश्चित्ररविवन्नास्तमायान्न चोदयम् ॥ ९२ ॥
हिन्दी अर्थ
वह मुनि चित्सामान्य के निरन्तर अभ्यास के कारण
सत्तासामान्य को प्राप्त करके अर्थात् दृश्य और उसके संस्कार का मूलोच्छेद होने पर उसके प्रथनरूप
चित्त्वव्यवहार का उपरम होने से स्वप्रकाशात्मक निरतिशय आनन्दसन्मात्र भाव का परिशेष होने के
कारण सत्ता समान्य को प्राप्त करके चित्रस्थ सूर्य के समान इस दुश्यप्रपच में न आविर्भाव को (उदय
को) प्राप्त करते थे ओर न तिरोभाव को (अस्त को) प्राप्त रहते थे