Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 54, Verse 93
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 54, verse 93 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 93
संस्कृत श्लोक
शमपरपदलाभप्राप्तिसंशान्तचेता गलितजननपाशः क्षीणसंदेहदोलः ।
शरदि खमिव शान्तं व्याततं चोर्जितं च स्फुटममलमचेतस्तद्वपुः संबभार ॥ ९३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार उक्त स्थिति को दिखाते हुए उपसंहार करते हैं ।
सब विक्षेपो के उपशमन होने के कारण तथा परमपद की प्राप्ति से शान्त चित्त जन्ममरणरूपी
पाशो का विनाश कर चुके ओर संशय रहित उस मुनि ने शरद् ऋतु के आकाश के समान शान्त,
अपरिच्छिन्न, अतितेजस्वी, स्फुट अर्थात् निरावरण होने के कारण प्रकाशमय, प्राक्तनदशा का अत्यन्त
विस्मरण होने के कारण चित्तरहित ब्रह्मस्वभावापन्न शरीर को धारण किया पहले की नाई उद्दालक
शरीर को धारण नहीं किया । अर्थात् ब्रह्मस्वरूप हो गये