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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 55, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 55, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

तदास्वादनतो लीनचित्सामान्यदशाक्रमम् । विश्वंभरमनन्तात्म सत्तासामान्यमाययौ ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

उस उद्दालक ऋषि का पूर्ववत्‌ सत्तासामान्य अनुप्रवेश कहते हैं। जब तक निरतिशय आनन्द का आस्वाद प्राप्त नहीं होता तभी तक चित्त अपनी वृत्तियों के निरोध से उत्पन्न क्लेश को सहन न करता हुआ बाह्यविषयो मे प्रवृत्त होता है । आनन्द का आस्वादन करने पर तो “गुडपिपीलिका' न्याय से वहीं पर आसक्त हुआ चित्त अपने स्वरूप को भी भूलकर अपने में अनुगत चित्सामान्य को निरतिशय स्वप्रकाश सत्तासामान्य को प्राप्त करा देता है, इसी को चित्सामान्यावस्थाक्रम का लय ओर सत्तासामान्य प्राप्त कहते हें । यही बात कही गई हे । उद्दालक ने आनन्द के आस्वादन से चित्सामान्य दशाक्रम के लयवाले, विश्वम्भर, अनन्त, परिपूर्ण, सत्तासामान्य को प्राप्त किया