Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अन्तर्मुखमना नित्यं सुप्तो बुद्धो व्रजन्नपि ।
पुरं जनपदं ग्राममरण्यमिव पश्यति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका मन सदा अन्तर्मुख है यानी बहिर्मुख नहीं है
वह पुरुष चाहे सोया हो, चाहे जागा हो, चाहे चलता हो वह नगर, देश ओर ग्राम को अरण्य के समान
देखता है