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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

सर्वमाकाशतामेति नित्यमन्तर्मुखस्थितेः । सर्वथानुपयोग्यत्वाद्भूताकुलमिदं जगत् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

नित्य अन्तर्मुख स्थितिवाले पुरुष के लिए पृथिवी आदि महाभूतो से व्याप्त यह सारा जगत्‌ बाधित होने के कारण सर्वथा अनुपयोगी होने से शून्यता को प्राप्त हो जाता है