Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
न बहिष्ठं न चान्तःस्थं क्वचित्किंचन विद्यते ।
यद्यथा कचितं चित्त्वात्तत्तथा तत्त्वमुत्थितम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
आरोप दृष्टि से कहकर अपवाद दृष्टि से कहते हैं।
कोई वस्तु न तो बाहर है और न कहीं पर भीतर है, तो जगदाकार का भान कैसे होता है, ऐसी
शंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि जिस वस्तु का पूर्व वासना के बल से विकास हुआ उसके वेष से
परमार्थ तत्त्व ही उदित हुआ है