Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
आत्मतत्त्वान्तरं भाति बहिष्ट्वेन जगत्तया ।
कर्पूरमिव गन्धेन संकोचे प्रविकासि च ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मतत्त्वरूप जो आन्तर वस्तु है वही बाह्यरूप होकर जगद्रूप
से प्रतीत होती है । जैसे डिब्बे में रक्खा हुआ कपूर गन्धरूप से विकसित (अधिक प्रदेश में विस्तृत)
होता है वैसे ही वह तत्-तत् उपाधियों के अनुसारी संकोच होने पर भी विकसित होता है