Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
संप्रबोधवती तीक्ष्णा कलङ्करहिता मतिः ।
सर्वसामग्र्यहीनापि पदं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्यक् प्रबोधयुक्त तीक्ष्ण ओर दोषरहित मति
अन्यान्य सब सामग्रियों से विहीन होती हुई भी जीव को परम पद प्राप्त करा देती है