Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 42–43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verses 42–43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
द्यौः क्षमा वायुराकाशं पर्वताः सरितो दिशः ।
कल्पादिरेव ज्वलितं सर्वमाधिहतात्मनः ॥ ४२ ॥
यस्त्वात्मरतिरेवान्तः कुर्वन्कर्मेन्द्रियैः क्रियाः ।
न वशो हर्षशोकाभ्यां स समाहित उच्यते ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
बड़े भारी नाश के भय का ही उपपादन करते हैं।
तत्-तत् मानसी व्यथाओं से हतात्मा पुरुष के द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश पर्वत, नदियाँ, दिशाएँ
आदि सब पदार्थ तीनों तापों की ज्वालाओं से ज्वलित होकर प्रलयारम्भकाल ही हो जाते हैं