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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 44–46

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verses 44–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 44,45

संस्कृत श्लोक

यः सर्वगतमात्मानं पश्यन्समुपशान्तधीः । न शोचति ध्यायति वा स समाहित उच्यते ॥ ४४ ॥ स पूर्वापरपर्यन्तां यः पश्यञ्जागतीं गतिम् । दृष्टिष्वेतासु हसति स समाहित उच्यते ॥ ४५ ॥ समे परेऽपि नाहंता न जगज्जन्मनो मयि । वीचिवृन्देष्विवातप्ता नाकाशे फलधातवः ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

सन्मात्र आत्मा का साक्षात्कार होने पर तो कर्मेन्द्रियों द्वारा व्यवहार करने पर भी अभिमान न होने से हर्ष शोक आदि जनित तनिक भी विक्षेप नहीं होता, इसलिए सदा समाधिस्थ पुरुष की समानता ही रहती है अर्थात्‌ व्यवहाररत भी ज्ञानी पुरुष समाधिस्थ के तुल्य ही होता है, इस आशय से कहते हैं । जो पुरुष अन्दर एकमात्र आत्मरति होकर कर्मेन्द्रियों से क्रिया करता हुआ हर्ष और शोक के वशीभूत नहीं होता, वह समाधिस्थ कहा जाता हे ॥४ ३॥ सर्वगत आत्मा का साक्षात्कार कर रहा अतएव शान्तधी जो पुरुष न शोक करता है और न ध्यान करता है, वह समाधिस्थ हो जाता है । जगत्‌ की गति को उत्पत्ति और विनाश युक्त देखता हुआ जो पुरुष मूढ़ जनों में प्रसिद्ध अहंता, ममता आदि दृष्टियों पर उपहास करता है वह समाधिस्थ कहा जाता हे