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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

सकलमिदमसावसौ च सर्वं जगदखिलं न विभागितात्र काचित् । परमपुरुषपावनैकरूपी स सदिति तत्सदकिंचिदेव नासौ ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञानी की सर्वात्मता को और सबकी तदात्मता को (ज्ञानिरूपता को) दृढ़ करते हुए दोनों की निष्प्रपंच चिन्मात्रता ही परमार्थतः फलित हुई, यह दशति है । ज्ञानी सब जगद्रूप हैँ ओर अखण्ड जगत्‌ ज्ञानीरूप है, क्योकि इस जगत्‌ में विभागिता (त्रिविध परिच्छेदशालिता) कुछ भी नहीं हैं । भेदकार्यं कारणोपाधियों के तत्‌ तत्‌ साक्षिचिन्मात्र होने पर वह (तत्त्वज्ञानी) सर्वजगत्‌ का अधिष्ठान सन्मात्र ही है, कारण कि वह परम, पूर्ण होने से पुरुष ओर सब दोषों से अस्पृष्ट होने से पावन जो परमात्मा है एकमात्र तद्रूप ही हे । इस रीति से सब द्वैतबन्धनों से निर्मुक्त सत्स्वरूपमात्र परिशिष्ट वह नित्यमुक्त हो गया