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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यदात्ममरिचस्यान्तश्चित्त्वात्तीक्ष्णत्ववेदनम् । तदहंतादि भेदादि देशकालादि चेत्यतः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार सारे जगत्‌ का चित्‌ से अभेद परमार्थरूप से सिद्ध होने पर व्यवहार अवस्था में भी जगत्‌ वैचित्र्य तत्‌-ततूरूप वित्स्वरूप ही है, ऐसा फलितार्थ हआ, यह कहते है । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, आत्मरूपी मीर्च के (आत्मा ही हुआ स्वप्रकाशरूप तीक्ष्णता से युक्त मिर्चा, उसके) अन्दर चेतन होने के कारण तीक्ष्णताप्रथितिरूप जो अनुभव है, वही स्वरूपज्ञान का अभाव होने के कारण मैं, तुम आदिरूप घट, दीवार भेद आदिरूप और उसके आधार देश-कालरूप जगत्‌ है । यह चित्‌ का अभेद होने से फलितार्थ हुआ

सर्ग सन्दर्भ

छप्पनर्वौ सर्ग समाप्त सत्तावनवाँ सर्ग अज्ञात स्वस्वरूप चैतन्य द्रष्टा होने के कारण जिस दुश्य स्वरूपता को धारण करता है वह चित्‌ ही है उससे अन्य नहीं है, यह वर्णन |