Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यदात्मलवणस्यान्तश्चित्त्वाल्लवणवेदनम् ।
तदहंतादि भेदादि देशकालादि मत्स्थितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मरूपी लवण के (नमक के) अन्दर चित्
होने के कारण लवणता प्रथितिरूप (प्रसिद्ध) जो वेदन है, वह अहं, त्वम् आदि; घट, दीवार भेद आदिरूप
ओर उसके आधार देश, काल आदि से युक्त जगद्-रूप से स्थित है