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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 56, Verses 7–9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 56, verses 7–9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इमं गुणसमाहारमनात्मत्वेन पश्यतः । अन्तःशीतलता यासौ समाधिरिति कथ्यते ॥ ७ ॥ दृश्यैर्मनसि संबन्ध इति निश्चित्य शीतलः । कश्चित्संव्यवहारस्थः कश्चिद्ध्याने व्यवस्थितः ॥ ८ ॥ द्वावेतौ राम सुखितावन्तश्चेत्परिशीतलौ । अन्तःशीतलता या स्यात्तदनन्ततपःफलम् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, इस मायिक विश्व को अनात्मरूप (मिथ्या) देख रहे पुरुष की जो यह अन्तःशीतलता यानी ज्ञान प्रतिष्ठा की फलभूत पूर्णकामता हे, वही समाधि कही जाती हे, क्योकि पूर्णकामता के प्राप्त होने पर विक्षेपो का प्रसंग ही नहीं रहता । मन के रहने पर दृश्य पदार्थो के साथ सम्बन्ध होता है, जो विक्षेप का हेतु हे, किन्तु मेरा मन नहीं हे, ऐसा निश्चय कर पूर्णकाम हुआ कोई पुरुष व्यवहारनिरत होता है और कोई ध्यान में निरत होता हे । यदि अन्तःकरण शीतल हो, तो ये दोनों ही सुखी हैँ । जो अन्तःकरण की शीतलता है, वह अनन्त तपस्याओं का फल हे