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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

न च किंचिच्चिनोत्यन्तश्चेत्यस्यासंभवे सति । विन्दते न च वा किंचिद्वेद्यस्यासंभवादसौ ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह आत्मा विकार होने योग्य वस्तु का अभाव होने पर अपने भीतर विभिन्‍न जीवादि चैतन्य रूप से कुछ भी विकार नहीं करता है और प्राप्त वस्तु के न रहने से उसकी प्राप्ति नहीं करता है