Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
जीवनं ज्ञातता ज्ञाता जीवनं जीवजीवनम् ।
अत्यन्तमस्ति नो भेदश्चिद्रूपत्वे ज्ञजीवयोः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जब इसने (जीव ने) सत्-शास्त्रों से और सद्-गुरुओं के उपदेशों से यह जान
लिया कि इस भोग्य जगत् का जीवन (सार) या परमार्थ स्थिति अधिष्ठानसन्मात्ररूप स्फूर्ति ही है
ओर भोक्ता का जीवन (सार) जिसके अधीन समस्त जीवों के जीवन है ऐसा आनन्दस्वरूप जीवन
ही है, तब भोग्य ओर भोक्ता दोनों के अधिष्ठानं की चिद्रूपता ही अवशिष्ट रह गई, ऐसी स्थिति
में जीव और ईश्वर का कभी भी भेद नहीं हे