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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

यथा ज्ञजीवयोर्नास्ति भेदो नाम तथैतयोः । भेदोऽस्ति न ज्ञशिवयोर्विद्धि शान्तमखण्डितम् ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव और इश्वर का भेद करनेवाले अज्ञान के विनष्ट हो जाने पर प्रज्ञ ओर तुरीय का भेद भी निवृत्त हो जाता है, अतः अखण्डपूणनिन्दैकरस चिन्मात्र का साम्राज्य सिद्ध हुआ, यह कहते है । जैसे वास्तव में जीव ओर ईश्वर का भेद नहीं हे, वैसे ही इस प्राज्ञ ओर तुरीय दोनों का भेद भी नहीं है । श्रीरामजी, असलियत मे आप उन सबको शान्त अखण्ड पूणनिन्दैकरस ब्रह्मरूप ही जानिये